दिल्ली के “यमुना किनारे तबाही का दिन!” — बुलडोजरों की दहाड़ में दफन हुए सपने, चीखों से गूंजा यमुना बाजार

नई दिल्ली।आज यमुना बाजार–यमुना घाट पर जो हुआ, उसने सिर्फ मकान नहीं तोड़े… पूरे-पूरे परिवारों के सपने मलबे में मिला दिए।सुबह की शुरुआत जैसे ही हुई, वैसे ही इलाके में गूंज उठी बुलडोजरों की दहाड़ — और कुछ ही घंटों में दशकों से बसे घर धूल में तब्दील होने लगे।भारी पुलिस फोर्स, चारों तरफ बैरिकेडिंग, और बीच में खड़े बेबस लोग…कोई अपना सामान बचाने में लगा था, तो कोई अपने ही टूटते घर को देखकर रो-रोकर बेहाल था।मां की आंखों में आंसू थे, बच्चों के चेहरे पर डर… और बुजुर्गों के सामने उजड़ती पूरी जिंदगी।

प्रत्यक्षदर्शियों का कहना है कि बिना किसी रहम के बुलडोजर चलते रहे, और लोग बस देखते रह गए।कुछ जगहों पर विरोध की कोशिश भी हुई, लेकिन पुलिस की सख्ती के आगे आवाजें दब गईं।“हम 50-60 साल से यहां हैं… अब कहां जाएं?”

सबसे बड़ा सवाल वही इन लोगों का कसूर क्या है?स्थानीय लोगों का दर्द साफ झलक रहा था:

“साहब, हमने यहीं जिंदगी बिताई… आज एक झटके में सब खत्म कर दिया।”लोगों का आरोप है कि उन्हें ना पर्याप्त वक्त मिला, ना ही कोई ठोस पुनर्वास (रहाबिलिटेशन ) की व्यवस्था दिखाई दी।प्रशासन इसे यमुना फ्लडप्लेन से अतिक्रमण हटाने की कानूनी कार्रवाई बता रहा है।कहा जा रहा है कि पहले नोटिस दिए गए थे, और कोर्ट से भी रास्ता साफ हो चुका था।

लेकिन जमीन पर जो तस्वीर दिखी वो कानून से ज्यादा एक मानवीय त्रासदी जैसी नजर आई।

यमुना किनारे चली इस कार्रवाई ने एक बार फिर बड़ा सवाल खड़ा कर दिया है

विकास के नाम पर क्या गरीबों का घर उजाड़ना ही रास्ता है?

यह सिर्फ खबर नहीं… एक दर्दनाक सच्चाई है।

आज मलबा सिर्फ ईंट-पत्थर का नहीं, बल्कि टूटी उम्मीदों का है।