ESI कार्ड के नाम पर निगम कर्मचारियों की जेब पर चोट, कटौती के बाद खाते में पैसा नहीं पहुंचने का आरोप

नई दिल्ली। दिल्ली नगर निगम में कर्मचारियों से जुड़ी ESI व्यवस्था को लेकर एक और गंभीर सवाल खड़ा हो गया है। आरोप है कि कर्मचारियों के वेतन से ESI कार्ड के नाम पर नियमित रूप से रकम काटी जा रही है, लेकिन संबंधित कर्मचारियों के ESI खाते में उसका रिकॉर्ड दिखाई नहीं दे रहा। ऐसे में सवाल उठ रहा है कि आखिर कर्मचारियों के वेतन से काटी जा रही रकम जा कहां रही है?

ESI व्यवस्था के तहत पात्र कर्मचारियों के वेतन से कर्मचारी अंशदान काटा जाता है और नियोक्ता को कर्मचारी के हिस्से के साथ अपना अंश भी निर्धारित प्रक्रिया के तहत ESIC में जमा करना होता है। मौजूदा दर के अनुसार कर्मचारी का अंशदान 0.75 प्रतिशत और नियोक्ता का 3.25 प्रतिशत है।

ऐसे में यदि निगम के वेतन रिकॉर्ड में ESI की कटौती हो रही है, लेकिन कर्मचारियों के ESI रिकॉर्ड में संबंधित अवधि का योगदान अपडेट नहीं है, तो यह सामान्य प्रशासनिक चूक है या वित्तीय स्तर पर कोई गड़बड़ी—इसकी जांच जरूरी है।

कटौती हो रही है तो जमा कहां हो रही है?

कर्मचारियों का सीधा सवाल है कि हर महीने वेतन से ESI के नाम पर राशि काटे जाने के बाद उस रकम की जमा प्रक्रिया क्या है? क्या निगम ने संबंधित महीनों का ESI चालान जमा किया है? यदि जमा किया है तो कर्मचारियों के व्यक्तिगत ESI रिकॉर्ड में उसका विवरण क्यों नहीं दिखाई दे रहा?

मामला इसलिए भी गंभीर है क्योंकि ESI केवल वेतन से होने वाली कटौती नहीं, बल्कि कर्मचारियों और उनके परिवार को सामाजिक सुरक्षा तथा चिकित्सा सुविधाओं से जोड़ने वाली व्यवस्था है। ESIC के मुताबिक वर्तमान में सामान्य कर्मचारियों के लिए ESI कवरेज की वेतन सीमा ₹21,000 प्रतिमाह है।

रिकॉर्ड का मिलान हुआ तो खुल सकता है पूरा खेल

इस मामले में निगम के वेतन बिल, कर्मचारियों की वेतन पर्ची, ESI चालान, बैंक भुगतान रिकॉर्ड और ESIC पोर्टल पर कर्मचारियों के योगदान का मिलान कराया जाए तो स्थिति साफ हो सकती है।

सबसे बड़ा सवाल यही है—अगर कर्मचारी के वेतन से पैसा काटा गया है, तो वह पैसा ESIC तक पहुंचा या नहीं? और अगर नहीं पहुंचा तो आखिर गया कहां?…कर्मचारियों की मांग है कि निगम प्रशासन पूरे मामले की जांच कराए और प्रत्येक कर्मचारी से काटी गई ESI राशि का महीनेवार हिसाब सामने रखे। यदि जांच में किसी स्तर पर अनियमितता मिलती है तो जिम्मेदार अधिकारियों और एजेंसी के खिलाफ कार्रवाई की जाए।

निगम में कर्मचारियों के नाम पर होने वाली हर कटौती का हिसाब सार्वजनिक होना चाहिए—क्योंकि यह कर्मचारियों की मेहनत की कमाई है, किसी की निजी रकम नहीं।