मेहरौली की अवैध इमारत ने खोली पूरी दिल्ली की पोल—सत्य निकेतन के बाद बुलडोजर दौड़ा, लेकिन सवाल वही: पहली ईंट पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

सात मंजिल खड़ी हुई, निगम सोता रहा!

नई दिल्ली। दिल्ली में अवैध निर्माण के खिलाफ अब बुलडोजर गरज रहा है, लेकिन राजधानी के सामने इससे भी बड़ा सवाल खड़ा हो गया है—जब एक इमारत में एक के बाद एक मंजिल जुड़ती रही, तो निगम का निगरानी तंत्र कहां था?

मेहरौली में सात मंजिला अनधिकृत इमारत सामने आने के बाद यह मामला अब केवल एक इलाके की बिल्डिंग तक सीमित नहीं है। यह पूरी दिल्ली की भवन नियंत्रण व्यवस्था पर सवाल है। अगर निर्माण अनधिकृत था तो पहली मंजिल, दूसरी मंजिल, तीसरी मंजिल और उसके बाद की मंजिलों पर कार्रवाई क्यों नहीं हुई?

सत्य निकेतन हादसे के बाद अचानक पूरी दिल्ली में अवैध और खतरनाक इमारतों की जांच तेज हो गई है। 12 जोन में कार्रवाई, सीलिंग और ध्वस्तीकरण अभियान शुरू है। लेकिन राजधानी पूछ रही है—क्या निगम को अवैध निर्माण दिखाई देने के लिए हादसा होना जरूरी है?

हादसे के बाद जागा सिस्टम, पहले क्यों नहीं?

सत्य निकेतन की घटना ने भवन सुरक्षा की निगरानी व्यवस्था की गंभीर खामियां सामने ला दीं। इसके बाद चार मंजिल से अधिक के अनधिकृत निर्माणों को सील करने और बड़े पैमाने पर पीजी परिसरों की जांच का अभियान तेज किया गया है।

रिपोर्टों के अनुसार करीब 1,100 पीजी परिसरों का सर्वे किया जा चुका है। यानी जिन इमारतों में बड़ी संख्या में छात्र और अन्य लोग रह रहे हैं, उनकी सुरक्षा अब जांच के दायरे में है।लेकिन सवाल यह है कि इनमें से कितनी इमारतें वर्षों से निगम की नजर के सामने थीं?

मेहरौली ने पूछा—‘सातवीं मंजिल तक कैसे पहुंचा निर्माण?’

सात मंजिला निर्माण कोई रातोंरात नहीं खड़ा होता। नींव से लेकर ऊपरी मंजिल तक निर्माण की लंबी प्रक्रिया होती है।फिर सवाल उठना स्वाभाविक है—

पहली मंजिल पर किसने देखा?

दूसरी मंजिल पर किसने रोका?

तीसरी मंजिल पर नोटिस क्यों नहीं?

चौथी मंजिल के बाद कार्रवाई क्यों नहीं?

और अगर नोटिस जारी हुआ था तो निर्माण सात मंजिल तक कैसे पहुंच गया?

यही सवाल अब मेहरौली से निकलकर पूरे दिल्ली नगर निगम तक पहुंच गया है।

12 जोन, एक ही सवाल—जवाबदेह कौन?

दिल्ली में निगम के 12 जोन हैं। अलग-अलग इलाकों में भवन निर्माण की निगरानी के लिए अधिकारियों की पूरी श्रृंखला मौजूद है। इसके बावजूद यदि किसी क्षेत्र में अनधिकृत निर्माण कई मंजिल तक पहुंच जाता है तो जिम्मेदारी केवल भवन मालिक की नहीं, निगरानी व्यवस्था की भी जांच का विषय बनती है।अब जरूरत सिर्फ यह बताने की नहीं कि कितनी इमारतें सील हुईं और कितनी गिराई गईं।

जरूरत यह बताने की है कि वे इमारतें बनने ही क्यों दी गईं?मेयर–कमिश्नर से दिल्ली के सीधे सवाल

मेयर से सवाल:

क्या निगम के सभी जोन में खतरनाक और अनधिकृत इमारतों की सूची पहले से तैयार थी?

कमिश्नर से सवाल:

क्या प्रत्येक जोन में नियमित भवन निरीक्षण की रिपोर्ट की समीक्षा होती है?

भवन विभाग से सवाल:

कितने मामलों में पहली शिकायत के बाद कार्रवाई हुई और कितने मामलों में कार्रवाई लंबित रही?

जोन अधिकारियों से सवाल:

एक मंजिल से सात मंजिल तक पहुंचे निर्माण का पता लगाने में निगरानी तंत्र क्यों विफल रहा?

अब ‘बुलडोजर’ के साथ ‘जवाबदेही’ भी चाहिए

दिल्ली को अवैध निर्माण के खिलाफ कार्रवाई चाहिए, लेकिन केवल बुलडोजर चलाने से व्यवस्था की कमजोरी खत्म नहीं होगी।जिसने अवैध निर्माण किया, उस पर कार्रवाई होनी चाहिए।लेकिन जिसने आंखों के सामने निर्माण बढ़ते देखा और कार्रवाई नहीं की, उसकी जिम्मेदारी भी तय होनी चाहिए।वरना हर हादसे के बाद कुछ इमारतें सील होंगी, कुछ ढहाई जाएंगी और कुछ दिन बाद फिर वही खेल शुरू हो जाएगा।

सबसे बड़ा सवाल: हादसे से पहले निगम क्यों नहीं जागता?

मेहरौली की सात मंजिला इमारत हो या दिल्ली के दूसरे इलाकों में खड़ी बहुमंजिला अवैध इमारतें—राजधानी अब सिर्फ कार्रवाई की तस्वीर नहीं देखना चाहती।

दिल्ली जानना चाहती है—

“अवैध इमारत की पहली ईंट किसकी नजर से बची और सातवीं मंजिल तक पहुंचते-पहुंचते सिस्टम ने आंखें क्यों बंद रखीं?”अब बुलडोजर चले तो उसके साथ जिम्मेदारी भी तय हो—तभी ‘सुरक्षित दिल्ली’ का दावा जमीन पर सच साबित होगा।