हादसे के बाद अफसर सस्पेंड, हादसे से पहले मेयर–कमिश्नर क्यों सोते रहे?
नेहरू विहार में 2023 का निगम नोटिस बना ‘कागजी कार्रवाई’! तीन साल बाद भी नहीं टूटी 5 मंजिला झुकी इमारत—सिविल लाइंस जोन की कार्यप्रणाली पर गंभीर सवाल
नई दिल्ली। सत्य निकेतन में इमारत गिरने के बाद जिम्मेदार अधिकारियों पर निलंबन की कार्रवाई से नगर निगम भले ही अपनी जवाबदेही तय करने का संदेश दे रहा हो, लेकिन नेहरू विहार की झुकी पांच मंजिला इमारत निगम की पूरी व्यवस्था पर ही सवाल खड़े कर रही है। सवाल सीधा है—जब खतरा तीन साल पहले दिखाई दे गया था तो मेयर और कमिश्नर की निगरानी में कार्रवाई हादसे से पहले क्यों नहीं हुई?

नॉर्थ दिल्ली के तिमारपुर थाना क्षेत्र के नेहरू विहार में ग्राउंड समेत पांच मंजिला इमारत खतरनाक तरीके से झुकी हुई बताई जा रही है। इमारत के आसपास स्टूडेंट्स की भारी आवाजाही है। पास में लाइब्रेरी और कोचिंग सेंटर हैं। ऊपर की ओर इमारतों के बीच चौड़ी दरार दिखाई देने की बात सामने आई है। ऐसे में स्थानीय लोगों में किसी बड़े हादसे का डर बना हुआ है।

2023 में नोटिस, 2026 में भी खतरा—तो तीन साल में हुआ क्या?
सबसे बड़ा सवाल खुद निगम की कार्रवाई पर है। स्थानीय लोगों के अनुसार निगम ने वर्ष 2023 में ही इमारत पर नोटिस चिपकाया था। यदि निगम की नजर में इमारत कार्रवाई योग्य थी, तो फिर तीन साल तक इसे सुरक्षित क्यों नहीं किया गया?
नोटिस लगाया और फाइल बंद कर दी?
खतरे की जानकारी थी तो डेमोलिशन क्यों नहीं?
खाली कराने की कार्रवाई क्यों नहीं?
स्ट्रक्चरल सेफ्टी की निर्णायक जांच क्यों नहीं?
इन सवालों का जवाब अब मेयर, कमिश्नर और संबंधित जोन के अधिकारियों को देना चाहिए।
सत्य निकेतन के बाद भी वही कहानी दोहराने की तैयारी?
सत्य निकेतन हादसे ने यह दिखा दिया कि खतरनाक इमारतों पर समय रहते कार्रवाई नहीं हुई तो एक प्रशासनिक चूक जानलेवा हादसे में बदल सकती है। वहां हादसे के बाद अधिकारियों पर कार्रवाई हुई, लेकिन नेहरू विहार का मामला पूछ रहा है कि क्या निगम की नीति ‘पहले हादसा, फिर कार्रवाई’ बन चुकी है?
अगर किसी इमारत के बारे में वर्षों पहले शिकायत या नोटिस मौजूद है, तो जिम्मेदार अधिकारी उस खतरे को खत्म करने के लिए क्या कर रहे थे? क्या किसी की जान जाने के बाद ही फाइलों से धूल हटेगी?

सिविल लाइंस जोन पर सीधा सवाल
नेहरू विहार सिविल लाइंस जोन के अधिकार क्षेत्र में आता है। ऐसे में जोन के जिम्मेदार अधिकारियों की भूमिका पर सवाल उठना स्वाभाविक है। तीन साल पुराने नोटिस के बावजूद इमारत आज भी खड़ी है तो आखिर जवाबदेही किसकी है?
स्थानीय लोगों के आरोप हैं कि इलाके में पहले भी इमारतों के झुकने की घटनाएं सामने आई हैं। उनका दावा है कि कुछ इमारतों को तोड़कर दोबारा बनाया गया, लेकिन समस्या फिर सामने आई। जमीन धंसने और नीचे से गुजरने वाली बड़ी सीवर लाइन के आसपास मलबा डाले जाने को लेकर भी स्थानीय स्तर पर सवाल उठाए जा रहे हैं। इन दावों की तकनीकी जांच आवश्यक है।
मेयर–कमिश्नर बताएं: कार्रवाई हादसे से पहले क्यों नहीं?
अब गेंद सीधे निगम के शीर्ष नेतृत्व के पाले में है। मेयर और कमिश्नर को बताना चाहिए कि राजधानी में खतरनाक इमारतों की निगरानी का सिस्टम क्या कर रहा है?
यदि 2023 का नोटिस मौजूद है तो उसकी अनुपालना क्यों नहीं हुई? संबंधित अधिकारियों ने कितनी बार निरीक्षण किया? इमारत को खाली कराने, सील करने या गिराने के लिए क्या कार्रवाई की गई? और यदि कार्रवाई नहीं हुई तो जिम्मेदार अधिकारी अब तक जवाबदेही से बाहर क्यों हैं?
सत्य निकेतन के बाद निलंबन करना आसान है, लेकिन असली प्रशासनिक परीक्षा हादसा होने से पहले खतरा पहचानकर उसे खत्म करने की है।
नेहरू विहार की झुकी इमारत आज निगम से यही सवाल पूछ रही है—
“मेयर–कमिश्नर साहब, हादसे का इंतजार क्यों?”
