सज्जन कुमार के निधन पर कांग्रेस की खामोशी पर सवाल, राजनीति के बदलते रिश्तों पर उठे सवाल

नई दिल्ली। राजनीति भी अजीब चीज है। सत्ता और संगठन के दौर में जिस नेता की तूती बोलती है, समय बदलते ही वही नेता हाशिए पर दिखाई देने लगता है। 80 वर्षीय सज्जन कुमार के निधन के बाद कांग्रेस की कथित चुप्पी ने राजनीति में रिश्तों और राजनीतिक स्वार्थ पर एक बार फिर सवाल खड़े कर दिए हैं।

एक दौर था जब दिल्ली की कांग्रेस की राजनीति में सज्जन कुमार, एच.के.एल. भगत और जगदीश टाइटलर जैसे नेताओं का खासा प्रभाव था। सज्जन कुमार ने लंबे समय तक कांग्रेस की राजनीति में सक्रिय भूमिका निभाई और पार्टी के लिए अपना राजनीतिक जीवन समर्पित किया। हालांकि 1984 के सिख विरोधी दंगों से जुड़े मामलों में उनका नाम आने के बाद कांग्रेस ने उनसे राजनीतिक दूरी बना ली।

निधन के बाद कांग्रेस की ओर से अपेक्षित सार्वजनिक संवेदना और श्रद्धांजलि को लेकर भी सवाल उठ रहे हैं। यहां तक कि पार्टी नेताओं की ओर से इस विषय पर प्रतिक्रिया लेने की कोशिशों के दौरान कई नेताओं ने टिप्पणी करने से परहेज किया। सवाल यह है कि राजनीतिक मतभेद और कानूनी विवाद अपनी जगह हैं, लेकिन क्या किसी व्यक्ति की मृत्यु के बाद मानवीय संवेदना भी राजनीति के चश्मे से देखी जानी चाहिए? सज्जन कुमार से कई बार मुलाकात करने वाले लोगों के अनुसार, उनसे बातचीत में जब यह सवाल पूछा जाता था कि कांग्रेस ने उनसे दूरी क्यों बना ली, तो वह मुस्कुराकर यही कहते थे कि उन्होंने जो कुछ किया, अपनी पार्टी के लिए किया। उनका दावा था कि परिस्थितियां चाहे जैसी रही हों, उन्होंने कांग्रेस का साथ नहीं छोड़ा।

यह प्रसंग राजनीति के उस बदलते चरित्र को भी सामने लाता है, जहां सक्रिय राजनीतिक जीवन में साथ देने वाले कई लोग विवादों में घिरने के बाद अकेले पड़ जाते हैं। सवाल सिर्फ सज्जन कुमार का नहीं है, बल्कि उस राजनीतिक संस्कृति का है जिसमें व्यक्ति के योगदान, पुराने रिश्तों और अंतिम समय की मानवीय गरिमा के बीच राजनीति खड़ी हो जाती है।

1984 के दंगों से जुड़े आरोपों और मामलों की गंभीरता अपनी जगह है और उन्हें नजरअंदाज नहीं किया जा सकता। लेकिन मृत्यु के बाद संवेदना व्यक्त करना किसी अपराध या राजनीतिक विरासत का समर्थन करना नहीं होता। लोकतांत्रिक राजनीति में असहमति और जवाबदेही के साथ-साथ मानवीय संवेदना की भी अपनी जगह है।

सज्जन कुमार का निधन कांग्रेस के साथ उनके दशकों पुराने राजनीतिक रिश्ते और उसके बाद आई दूरी की कहानी को फिर चर्चा में ले आया है। अब सवाल कांग्रेस से है—क्या राजनीति में पुराने रिश्तों और मानवीय संवेदना के लिए भी कोई जगह बची है?