नई दिल्ली। सरकारी नौकरी और नोएडा में प्लॉट पाने का सपना दिखाकर लोगों को ठगने वाला एक ऐसा “एडीएम साहब” दिल्ली पुलिस के हत्थे चढ़ा है, जो वास्तव में प्रशासनिक अधिकारी नहीं बल्कि ठगी की यूनिवर्सिटी का अनुभवी छात्र निकला। वर्षों तक खुद को उत्तर प्रदेश का अतिरिक्त जिला मजिस्ट्रेट बताने वाले इस शख्स ने रौब, रसूख और सरकारी पहचान का ऐसा जाल बुना कि कई लोग उसके झांसे में आ गए और करीब 60 लाख रुपये गंवा बैठे।
दिल्ली पुलिस की जांच में सामने आया कि आरोपी पवन कुमार पांडे उर्फ वरुण कुमार पांडे ने अफसरशाही का ऐसा किरदार निभाया कि असली अफसर भी शायद शर्मा जाएं। विजिटिंग कार्ड से लेकर पहचान पत्र तक सब कुछ तैयार था। बस एक चीज नहीं थी—सरकारी नौकरी।
पुलिस के मुताबिक आरोपी लोगों को भरोसा दिलाता था कि उसके बड़े-बड़े अधिकारियों से सीधे संबंध हैं। नौकरी चाहिए? हो जाएगी। नोएडा में प्लॉट चाहिए? वह भी मिल जाएगा। बस पहले “प्रोसेस” के नाम पर रकम जमा कराइए। लोगों ने भी सरकारी दफ्तरों की लंबी कतारों से बचने के लालच में जेबें खोल दीं और साहब की “सेवा” लेते रहे।
जांच में पता चला कि आरोपी ने एक वास्तविक पीसीएस अधिकारी की पहचान और तस्वीरों का इस्तेमाल कर खुद को एडीएम साबित किया। यानी सरकारी कुर्सी तो नहीं मिली, लेकिन उसकी पहचान पर ही पूरा कारोबार खड़ा कर लिया गया। मोबाइल फोन, व्हाट्सएप चैट, फर्जी आईडी कार्ड और विजिटिंग कार्ड देखकर ऐसा लगता था मानो कोई अधिकारी नहीं, बल्कि चलता-फिरता सचिवालय सामने खड़ा हो।
दिल्ली पुलिस ने जब बैंक खातों और यूपीआई लेनदेन की परतें खोलीं तो ठगी की रकम का पूरा हिसाब सामने आ गया। इतना ही नहीं, इस कमाई से खरीदी गई एक स्विफ्ट कार और एक स्कूटी का भी पता चला। यानी सरकारी नौकरी तो किसी को नहीं मिली, लेकिन ठगी की नौकरी ने आरोपी को अच्छी-खासी “सैलरी” जरूर दे दी।
दिलचस्प बात यह है कि आरोपी पर पहले भी प्रतिरूपण का मामला दर्ज हो चुका है। बावजूद इसके वह अफसर बनने का सपना छोड़ नहीं पाया। फर्क सिर्फ इतना था कि इस बार उसका तबादला सीधे पुलिस हिरासत में हो गया।
अब पुलिस उसके अन्य साथियों और संभावित पीड़ितों की तलाश कर रही है। वहीं यह मामला एक बार फिर याद दिलाता है कि सरकारी नौकरी और प्लॉट दिलाने का दावा करने वाले “चमत्कारी अफसरों” से सावधान रहना ही बेहतर है, क्योंकि कई बार कुर्सी असली नहीं होती, सिर्फ रौब असली होता है।
